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1. प्रस्तावना - भारत की स्वतन्त्रता के साथ ही उपलब्ध जल संसाधनों का जनहित म्ों अधिक से अधिक लाभ देने की दिशा म्ों बडे बडे बाधों का निर्माण आरम्भ हुआ था। तदनुसार चम्बल नदी परियोजना के अन्तर्गत चम्बल नदी पर गॉधी सागर, राणा प्रताप सागर, जवाहर सागर, और कोटा बैराज का निर्माण हुआ। चम्बल परियोजना क्ष्ोत्र म्ों सिचिंत क्ष्ोत्र 4,85,000 हैक्टेयर क्ष्ोत्र म्ों राजस्थान के कोटा, बून्दी एवं बारॉ जिले म्ों फैला हुआ है, जिसम्ों से 2,29,000 हैक्टेयर भूमि सिंचाई योग्य है। वर्ष 2011 म्ों हुई जनगणना के अनुसार इस क्ष्ोत्र की कुल जनसंख्या 25.98 लाख (अनुमानतः) है। चम्बल अन्तर्राज्यीय बहुद्देषीय वृहद परियोजना तीन चरणों मे राजस्थान एवं मध्यप्रदेश के साझेदारी मे पूर्ण की गयी थी। प्रथम चरण मे गॉधी सागर बांध व कोटा बैराज का निर्माण किया गया जो क्रमषः मध्यप्रदेष व राजस्थान म्ों स्थित है। द्वितीय चरण के अन्तर्गत राणा प्रताप सागर बांध का निर्माण किया गया जो राजस्थान के चित्तोड़गढ़ जिले म्ों स्थित है। तृतीय चरण म्ों जवाहर सागर बांध (जो राजस्थान के बूंदी जिले म्ों स्थित है) को पूर्ण किया गया। गॉधी सागर बांध का अधिकतम भराव जलस्तर 1312 फीट एवं क्षमता 5.936 मिलीयन एकड़ फीट (एम.ए.एफ)  एवं उपयोगी जल क्षमता न्यूनतम जलस्तर 1250 फीट के अनुसार 5.5109 एम.ए.एफ है। गांधीसागर बांध का जल ग्रहण क्ष्ोत्र 8700 वर्ग मील (22533 वर्ग कि.मी.) है जिसम्ों मध्यप्रदेष राज्य का 20938 वर्ग कि.मी. तथा राजस्थान राज्य का 1595 वर्ग कि.मी. है। राणा प्रताप सागर बांध का अधिकतम जलस्तर 1157.50 फीट एवं कुल भराव क्षमता 2.355 एम.ए.एफ एवं उपयोगी जल भराव क्षमता न्यूनतम जल स्तर 1128.5 फीट के अनुसार 1.1694 एम.ए.एफ है। जवाहर सागर बांध की कुल भराव क्षमता 0.055 एम.ए.एफ एवं उपयोगी भराव क्षमता 0.02 एम.ए.एफ है। गॉधी सागर, राणा प्रताप सागर व जवाहर सागर बांध से सीध्ो कोई सिंचाई नही की जाती है केवल बिजली का उत्पादन किया जाता है। गांधी सागर व राणा प्रताप सागर बांध म्ों ही सिंचाई के लिए पानी का भराव होता है। वर्ष 1960 के लगभग नहरी तंत्र का निर्माण किया गया जिसम्ों दॉई व बॉई मुख्य नहर शामिल थी। कोटा बैराज से दॉई मुख्य नहर एवं बॉई मुख्य नहर निकली है जिनकी निस्सारण क्षमता क्रमषः 6656 क्यूसेक्स एवं 1500 क्यूसेक्स है। दॉई मुख्य नहर 124 कि.मी. राजस्थान म्ों एवं 248 कि.मी. मध्यप्रदेष की सीमाओं म्ों जल प्रवाहित करती है। राजस्थान म्ों दॉई मुख्य नहर एवं बॉई मुख्य नहर के द्वारा 2,29,000 हैक्टेयर म्ों सिंचाई  की जाती है। जिससे कोटा (333 गॉव), बून्दी (287 गॉव)  व बारॉ (113 गॉव) जिले के कुल 733 गॉव लाभान्वित होते है। दॉई मुख्य नहर से मध्य प्रदेष की भी लगभग इतनी ही भूमि सिंचित होती है। दॉई एवं बॉई मुख्य नहर का राजस्थान म्ों सिंचित  क्ष्ोत्र क्रमशः 1.27 लाख हैक्टेयर एवं 1.02 लाख हैक्टेयर है। मध्य प्रदेष को दॉई मुख्य नहर के पार्वती एक्वाडक्ट पर पानी दिया जाता है। बॉई मुख्य नहर 2.59 कि.मी. लम्बी है जो कि सिर्फ राजस्थान म्ों ही सिंचाई  करती है। दांयी व बॉई मुख्य नहरों की शाखाओं, उपशाखाओं एवं वितरिकाओं की कुल संख्या 63 तथा माईनरों की कुल संख्या 532 है। चम्बल परियोजना के संचालन हेतु राजस्थान मध्यप्रदेश अन्तर्राज्य बोर्ड का गठन किया हुआ है। दॉई मुख्य नहर पर होने वाले खर्च म्ों राजस्थान की 24.6 प्रतिशत तथा मध्यप्रदेश की 75.4 प्रतिषत हिस्सेदारी रहती है। गॉधी सागर, राणा प्रताप सागर एवं जवाहर सागर पर विद्युत उत्पादन किया जाता है। चम्बल परियोजना से राजस्थान और मध्यप्रदेश के हजारों गॉवों व शहरों के लाखों लोगों पशुधन व ओद्योगिक संस्थानों को पानी उपलब्ध होता है। चम्बल सिंचित  क्ष्ोत्र म्ों मुख्यतया चार प्रकार की मृदाए है जिसम्ों लगभग 62 प्रतिशत क्ष्ोत्र का प्रतिनिधित्व चम्बल श्रेणी, 23 प्रतिशत क्ष्ोत्र म्ों कोटा श्रेणी एवं बचे हुए क्ष्ोत्र का प्रतिनिधित्व सुल्तानपुर एवं बून्दी श्रेणी करती है। चम्बल एवं कोटा श्रेणी की मृदाओं म्ों क्ले कण 40 प्रतिशत से अधिक होते हैं जिससे इनम्ों जल रिसाव की कमी होती है। यह मृदाऐं काफी उपजाऊ है। बून्दी एवं सुल्तानपुर श्रेणीयाँ रेतीली हैं एवं तुलनात्मक दृष्टि से कम उपजाऊ हैं। चम्बल परियोजना का मूल उद्देश्य इस क्ष्ोत्र के किसानों की वर्षा पर निर्भरता को कम करते हुये उचित समय पर समुचित सिंचाई सुविधाए उपलब्ध कराना एवं इस क्ष्ोत्र के उत्पादन म्ों वृ़द्ध करना था। परन्तु उस अपेक्षित स्तर तक कृषि उत्पादन म्ों वृद्धि नही हो सकी जिसकी परिकल्पना परियोजना के रूपाकंन के समय की गई थी। जिसके आधार पर विष्व बैंक ने जून 1974 म्ों राज्य सरकार को इस क्ष्ोत्र के समन्वित विकास हेतु ऋण स्वीकृत किया। इसके अन्तर्गत चम्बल सिंचित क्ष्ोत्र विकास परियोजना (सीएडी) का कार्य प्रारम्भ किया गया। राजकीय आदेष क्रमांक एफ 6 (13)कृषि/73/ 3934-4026 दिनांक 25.07.1974 के द्वारा चम्बल क्ष्ोत्रीय विकास प्राधिकरण की स्थापना की गई ।

2. सिंचित  क्ष्ोत्र विकास प्राधिकरण के उद्देश्य  - सिंचित क्षेत्र विकास कार्यक्रम का उद्देश्य माइक्रो स्तर पर अवसंरचना विकास और कुशल खेत जल प्रबन्धन के माध्यम से सृजित और प्रयुक्त सिंचाई क्षमता के बीच अन्तराल को कम करते हुए कृषि उत्पादन को बढाना ताकि किसानो के सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में सुधार लाया जा सके। सिंचित क्ष्ोत्र विकास प्राधिकरण (काडा)ं, चम्बल सिंचित  क्ष्ोत्र के समन्वित विकास एवं पानी के समुचित उपयोग के साथ-साथ इस क्ष्ोत्र की जल वितरण प्रणाली के आधुनिकरण, मरम्मत तथा जलोत्सरण के लिये उत्तरदायी है। उक्त प्राधिकरण को निम्न दायित्व भी सोंपा गया है :-ऽ सिंचाई पद्धति का आधुनिकीकरण एवं रख रखाव।ऽ जलोत्सरण योजनायें तैयार करना एवं उनको कार्यान्वित करना।ऽ भूमि विकास कार्यक्रम की योजना बनाना एवं क्रियान्वित करना। ऽ वाराबंदी प्रणाली लागू करना। ऽ ख्ोतो की सीमाओ का पुर्ननिर्धारण करना।ऽ उपयुक्त फसल पद्धति का चयन एवं परिचालन। 3. प्रशासनिक व्यवस्था एवं संगठनात्मक ढांचा सिंचित क्ष्ोत्र विकास की योजनाओं को सही ढंग से मार्ग दर्शन करने के लिये भारतीय प्रषासनिक सेवा के वरिष्ठतम अधिकारी को क्षेत्रीय विकास आयुक्त के रूप म्ों नियुक्त किया गया है जिनको सिंचाई  एवं कृषि विभाग के विभागाघ्यक्ष के अधिकार दिये गये है। यद्यपि तकनिकी दृष्टि से इन विभागो के विभागाघ्यक्ष कार्य करेगे किन्तु प्रशासनिक दृष्टि से क्षेत्रीय विकास आयुक्त सभी विभागों के समन्वय का दायित्व निर्वहन करेगें। क्षेत्रीय विकास आयुक्त को प्रशासनिक मामलों म्ों सहयोग देने के लिए अतिरिक्त क्ष्ोत्रीय विकास आयुक्त का पद भी सृजित है। प्रत्येक इकाई का कार्य सम्पादित करने की दृष्टि से प्रत्येक इकाई म्ों एक वरिष्ठ अधिकारी नियुक्त किया गया है। 4. मुख्य गतिविधियॉंसिंचित क्ष्ोत्र विकास कार्यक्रम (चम्बल) कोटा एक समेकित परियोजना है जिसके अंतर्गत सिंचाई, जलोत्सरण, भूमि विकास, कृषि विस्तार व कृषि अनुसंधान आदि के कार्य किए जा रहे है। सिंचित क्ष्ोत्र विकास के अंतर्गत प्रस्तावित उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु निम्न इकाइयों का गठन किया गया हैः-

1; सिंचाई ईकाई 2; भूमि विकास ईकाई 3; क़षि विस्‍तार ईकाई 4; क़षि अनुसंधान ईकाई 5; राजस्‍व ईकाई 6; लेखा ईकाई 7; विधि ईकाई 

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